Thursday, August 5, 2021

नेताओ की भाषा से भी जुड़ी हैं भारतीय संस्कृति  और उसकी गरिमा-

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नेताओ की भाषा से भी जुड़ी हैं भारतीय संस्कृति  और उसकी गरिमा-
रिपोर्ट -:गौरव बाजपेयी

किसी भी देश में सफल लोकतंत्र के लिए राजनीतिक दलों का होना आवश्यक है । राजनीतिक दलों को लोकतंत्र का प्राण कहा जाता है, लेकिन आज इस प्राण को लेने के लिए यमराजों की संख्या दिनोदिन बढ़ती जा रही है ।

हम पहले भारतीय है और भारत की गरिमा सर्वांगीण व सर्वोपरि हैं,

परंतु शायद यह आजकल के नेता भूल चुके हैं, सत्ता के लोभ में कि हमारा भारत देश  विभिन्न संस्कृतियो ,विरासतों का देश है जिसमे दूसरे देश भी भारत की संस्कृतियो का उदाहरण देते हैं  परंतु दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि आजकल की राजनीति में इतने अपशब्दों का प्रयोग हो रहा है,जिससे प्रधानमंत्री ही नही बल्कि हमारे भारत की गरिमा की भी बात आ जाती है, यदि बात करे राजनीति की तो कहने के लिए अन्य भी कई तरीको से हम अपनी बात को कह सकते हैं ,लेकिन सत्ता के इन लालची लोगो को सिर्फ सत्ता की कुर्सी ही दिखती हैं न कि हमारे देश की मर्यादा व छवि?

जनता आज इन्हीं यमराजों से तबाह हो रही है  वे तरह-तरह के मुद्‌दों की अग्नि सुलगाकर उसमें घी का काम कर रहे हैं । इस ज्वाला की लपटों में झुलसती है तो केवल यहाँ की निर्दोष जनता । राजनीतिक दलों द्वारा उत्पन्न इस संकट से केवल भारत ही नहीं वरन् अमेरिका, रूस, फ्रांस, इटली, इंग्लैंड इत्यादि दुनिया बड़े-बड़े देश जूझ रहे हैं ।

बुद्ध, महावीर, राम, कृष्ण और गांधी जैसे महापुरुषों की यह पुण्य-भूमि सदियों से सिद्धांत, अनुशासन, सत्य और अहिंसा की राह दुनिया को दिखानेवाले भारत के लिए यह कैसी त्रासदी है कि यहाँ राजनीति के दौर की समाप्ति के साथ ही लुभावने नारे, तुष्टीकरण की नीति, धन, हिंसा, असामाजिक और संदिग्ध चरित्रवाले व्यक्तियों का राजनीति में धड़ल्ले से प्रवेश हो रहा है ।

आखिर क्या हो गया है ?हमारे  देश के  राजनेताओ को पहले जिस देश मे घोटालो, भ्रष्टाचार की बातें होती थी परंतु आज तो नेता नगरी में समझ ही नही आता गालियों का दौर जोरशोर से चालू हो गया?

हम देशवासियों की बात न करते हुए सिर्फ मोदी को ही कोसने औऱ गालिया देने में ही सभी मगन दिखाई दे रहे है ,बडे दुःखद व शर्मसार कर देने वाले बयान व  भाषण है कहे जा रहे हैं जिनमे इस बात का भी ख्याल नही किया जाता है कि हम जिसको कह रहे हैं वो इस देश का वर्तमान प्रधानमंत्री हैं उनकी प्रतिष्ठा भी छोड़ो तो एक ओर तो आप ख़ुद की बात करो तो खुद को ज़िम्मेदार वरिष्ठ नेता कहलाते हो तो दूसरी ओर मल्लिकार्जुन खड़के कहते हैं कि  काँग्रेस की सीट आने पर प्रधान मंत्री फाँसी  से लटक जायेगे,तो कही राहुल गांधी नारे  लगवाते हैं कि चौकीदार चोर हैं,प्रियंका गांधी दुर्योधन,शशी थुरूर हिटलर,अखिलेश साजिशकर्ता  सोनिया गांधी  नवजोत सिंह,सिद्धू,वही ममता बनर्जी हिसाब लेने की बात कहती हैं,तो कही राम के भी नाम का विरोध किया जाता हैं तो कोई तमाचा कांड हो या गुजरात के लिए सभी चीजों का सिर्फ एक ही जिम्मेदार कसूरवार व्यक्ति  है,और वो हैं नरेन्द्र मोदी !

हमे ये दु:ख नही कि मोदी को गालियाँ दे ,अपशब्द कहे ,बल्कि इस बात का दु:ख है कि हमारे भारत वर्ष की छवि प्रतिष्ठा संस्कृति दांव पर लगा कर राजनीत करना कैसे भी सही नही. राजनीतिक दलों के मन में देश हित से विमुख होकर सत्ता-पद का मोह प्रबल है । परार्थ का स्थान स्वार्थ ने ले लिया है, फलत: राजनीति में स्वार्थपूर्ति के लिए छल-कपट आदि का प्रयोग बेहिचक किया जाता है । पदों तथा स्वार्थों के लिए अहिंसा के पुजारियों ने धीरे-धीरे हिंसा का मार्ग अपनाना शुरू कर दिया है । चुनाव के समय ये राजनीति दल विनम्रता, शालीनता और मधुर-भाषिता की चादर ओढ़े जनता को उलटे उस्तरे से छूते नजर आते हैं ।

सामान्यत: राजनीतिक दलों की कोशिश रहती है कि गलत कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं और नेताओं को संरक्षण-प्रश्रय दिया जाए । इस अवांछनीय प्रवृत्ति का लाभ उठाने के लिए अपराधी तथा असामाजिक तत्त्व राजनीतिक दलों के सदस्य तथा सक्रिय कार्यकर्त्ता बन जाते हैं लेकिन अपनी बात को कहने का पूर्ण हक़ है परंतु तरीका वो नही जो आजकल जोर-शोर से प्रयोग किया जा रहा है ,बहुत से अन्य तरीके हैं जिनसे भी हम अपनी बात को रख सकते है।

सभी दल किसी-न-किसी मुद्‌दे पर अपनी राजनीति चला रहे हैं । पिछड़े वर्गों को आरक्षण, मंदिर-मसजिद विवाद और हिंदुत्व पुनर्जागरण जैसे अंनेक मुद्‌दे प्रमुख हैं । इन मुद्‌दों पर वे नागरिकों में वर्ग-विभेद, विद्वेष, तनाव जैसी स्थितियाँ पैदा कर रहे है।

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