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प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में उद्योगपतियों आदि से लिये जाने वाले राजनैतिक चंदे पर विशेष-भोला नाथ वरिष्ठ पत्रकार

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प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में उद्योगपतियों आदि से लिये जाने वाले राजनैतिक चंदे पर विशेष-

प्रजातंत्र में लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने के लिए
राजनीति को एक माध्यम बनाया गया है और लोकतंत्र में राजनीतिक गतिविधियों को संचालित करने के लिए जन सहयोग यानी चंदा लेने की व्यवस्था बनाई गई है। हमारे संविधान में भी राजनैतिक दलों को समाज के विभिन्न वर्गों से अपनी पार्टी चलाने उसे विस्तार देकर चुनाव लड़ने के लिए चंदा लेने की व्यवस्था की गई है। चंदा और सहयोग दोनों स्वार्थ से ऊपर उठकर अगर लिये दिये जाते हैं तो निस्वार्थ दिया गया वह चंदा अथवा दान परोपकारी बहुजन हिताय बहुजन सुखाय हो जाता है। हमारे देश में भी आजादी के बाद कुछ राजनैतिक दल ऐसे थे जिनके समय में “एक खुराक खाने का सीधा एक नोट और पूरे घर घर की ओट मांग कर राजनीति करने की परम्परा रही है लेकिन तब चुनाव इतना खर्चीला नहीं होता था। चुनाव तांगा इक्का और एक दो जीप से विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ लिए जाते थे। राजनीतिक दल के लोग चुनाव के समय प्रचार करने गांव गांव घर घर जाते थे और चुनाव प्रचार को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए जहां जाते एवं रुकते थे वहां पर एक खुराक खाना एक नोट और पूरे घर की वोट मांगते थे जिसे पार्टीभक्त मतदाता खुशी खुशी उन्हें यह तीनों चीजें निस्वार्थ रूप से दे देता था और बदले में कोई बड़ी अपेक्षा नहीं करता था। मतदाता तो बिना किसी स्वार्थ के वशीभूत हुये भावना में आकर राजनीतिक दलों एवं उनके प्रत्याशियों समर्थकों को चंदा दे देता था लेकिन व्यवसाय उद्योग धंधे से जुड़े हुए उद्योगपति ठेकेदार कभी निस्वार्थ भाव से चंदा नहीं देते हैं। आज का जमाना दस लगा कर दस हजार कमाने वाला आ गया है इसलिए चाहे उद्योगपति हो या कोई अन्य अगर वह राजनीतिक दलों को चंदा देता है तो बदले में उससे अपेक्षा भी करता है। अब तक राजनैतिक दलों को जो चंदा मिलता था उसमें देने वाले का नाम जग जाहिर होता था लेकिन अब तो वह जमाना आ गया है कि चंदा देने के बाद बैंकों के माध्यम से बांड बिकने लगे हैं जिसमें देने वाले का नाम ही नहीं होता है सिर्फ राजनीतिक दलों के पास चंदा मिलने का एक अभिलेख जरूर होता है। चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य पिछले वर्षों सरकार द्वारा संविधान में संशोधन करके चंदा बांड योजना लागू की गई थी जिस पर इस समय देश की सर्वोच्च अदालत सुनवाई कर रही है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में राजनैतिक गतिविधियों को चलाने के लिए चंदा लेने की व्यवस्था राजनीतिक दलों के लिए भले ही लाभकारी साबित हो लेकिन देश की प्रजा एवं प्रजातांत्रिक व्यवस्था के लिए उसे कतई लाभकारी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देश का मतदाता ही उपभोक्ता होता है जो उद्योगपतियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं को खरीदकर उद्योग को सफलता के चरम पर पहुंच आता है। उद्योगपतियों द्वारा चंदा कोई अपने बाप की कमाई से नहीं बल्कि उद्योग धंधे में कमाई करके दिया जाता है और रोजगार धंधे में चार लगाकर चालीस कमाने की कोशिश करता है। यह राजनैतिक चंदा किसी एक को नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दलों को मिलता है इसलिए अपने मानदेय भत्ते में वृद्धि की तरह जब चंदे की बात आती है तो भी राजनैतिक दल एक मत हो जाते हैं और उसका विरोध नहीं करते हैं। चुनाव में उद्योगपतियों द्वारा राजनैतिक दलों को दिया जाने वाला चंदा ही चुनाव के बाद महंगाई को बढ़ा देता हैं जिसका खामियाजा देश के आम उपभोक्ताओं को झेलना पड़ता है। प्रजातांत्रिक देश में मतदाओं के हितों को नजरदांज कर उद्योगपतियों से चंदा लेकर चुनावी समर लड़ना लोकतंत्र के भविष्य के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है। राजनीतिक दलों द्वारा उद्योगपतियों से चंदा लिए जाने के बदले उनकी लाभकारी शर्तों एवं प्रस्तावों को मानना ही नहीं बल्कि उनका बैंक कर्जा भी माफ करके उपभोक्ताओं के साथ मनमानी करने की छूट भी देनी पड़ती है जो देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर डालता है और उपभोक्ताओं के लिए मुसीबत बन जाता है। प्रजातंत्र में राजनैतिक संगठनों को चलाने के लिए सदस्यता को आर्थिक मदद का एक सशक्त माध्यम माना गया है। सदस्यता से प्राप्त धन राशि से पार्टी की गतिविधियों को संचालित करने की व्यवस्था है लेकिन आज के बदलते राजनैतिक दौर में लाखों-करोड़ों रुपए की मदद से हेलीकॉप्टर पर बैठकर चुनाव प्रचार करने और अपनी चुनावी मुहिम को बुलंदियों तक पहुंचाने में खर्च करने में गुरेज नहीं कर रहे हैं जैसे उन्हें इस बात की कतई चिंता नहीं है इसका खामियाजा देश की उसकी जनता जनार्दन को भुगतना पड़ेगा।

भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बराबंकीयूपी।।

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